पीलीभीत ‘नरभक्षी संकट’ - एक पुनर्गठन | WWF India

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्तिथ पीलीभीत टाइगर रिज़र्व के साथ लगे गन्ने और गेहू के खेतों मे बेचैनी ने कोलाहल का रूप ले लिया है. इस कोलाहल का केंद्र एक उभरती त्रासदी है जो एक या एक से अधिक बाघों द्वारा गत नवंबर से १५ लोगो की दुर्भाग्यपूर्ण मौत के रूप मे उभरी है. 

जब क्रोध और भय से ग्रस्त ग्रामीण राजमार्गों को अवरुद्ध कर वन विभाग के अधिकारियो पर आरोप प्रत्यारोप लगाते है, उस समय मीडिया द्वारा सनसनीखेज खबरे आग मे घी का काम करती है और विषयस्थिति का आंकलन साफ़ नहीं हो पाता है. ऐसी अनियंत्रित परिस्थिति मे जो सोच और समाधान पीलीभीत मानव-बाघ संघर्ष के संदर्भ मे अभी तक उभरे है वो अपर्याप्त और अविवेकपूर्ण है.  

बहुतायत मे गलतफहमिया

मानव-बाघ रिश्तों को लेकर भ्रांतिया दूर-दूर तक फैली हुई है. उदहारण के लिए कुछ लोगो का मानना है की पीलीभीत मे मानवों और बाघों की सानिध्यता संघर्ष का कारण है. इसके ठीक विपरीत कुछ लोगो का कहना है की इस इलाके के बाघ इंसानो से परिचित नहीं है इसलिए वे इंसानो को नुक्सान पहुंचाते है.   "नरभक्षी बाघों" की बढ़ती संख्या भी एक चर्चित विषय है. और कुछ लोगो का दावा है की पीलीभीत को टाइगर रिज़र्व का दर्ज़ा मिलने से बाघों की संख्या दोगुनी हो गयी है और ये बाघ शिकार की तलाश मे खेतों और गांवो तक आ जाते है. यह आरोप भी लगाया जाता है की नरभक्षी बाघों को जंगलो मे छोड़ा गया है. इन गलतफमियों के कारण समस्या की जड़ तक जाना मुश्किल हो गया है. ऐसी परिस्थिति मे बाघ के व्यहवार और इस इलाके की भौगोलिक स्थिति को बेहतर तरीके से समझना ज़रूरी है. 

पीलीभीत मे मानव-बाघ रिश्ते की समझ

पीलीभीत को टाइगर रिज़र्व का दर्ज़ा मई २०१४ मे मिला, इससे पहले यह छेत्र उत्तर भारत का सबसे अधिक लकड़ी प्रदान करने वाला आरक्षित वन था. जंगल एवं लकड़ी के प्रबंधन के लिए अनेको वनकर्मी जंगल मे आवागमन करते थे. पशुओं को चराने एवं वनोपज इकट्ठा करने के लिए रोज़ाना हज़ारों ग्रामीण भी इन जंगलो मे आया जाया करते थे. इस कारण पीलीभीत के बाघ अपने प्राकर्तिक आवास मे इंसानो के मौजूदगी के आदी है. यहाँ के लोग कई पीढ़ियों से बाघो के आसपास रहते आये है - इसलिए हम ये मान के चल सकते है की यहाँ बसने वाले लोग जानते है की अँधेरे मे जंगलो मे जाना खतरनाक हो सकता है, और वो बाघों के आसपास रहने के जोखिम से खूब वाकिफ है. तो यह तर्क किया जा सकता है की पीलीभीत में बाघों के हमले की वजह एक दूसरे से अपरिचितता नहीं है. शायद इसका कारण इलाके की ख़ास भौगोलिक स्थिति, इंसान और बाघों दोनों की मौजूदगी और यहाँ के लोगो की जंगलो और वनोपज पर अधिक निर्भरता है, और इसी वजह से संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है.

पीलीभीत भौगोलिक दृष्टि से एक अत्यंत संकरा छेत्र है और इस इलाके मे खेतों और जंगल के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है. वन्य जीवो की दृस्टि से देखे तो ये खेत घास के मैदान सा दीखता है. खेतों में सिचाई के कारण पानी की उपलब्धता अच्छी होती है, इसकी वजह से सूअर, हॉग डिअर आदि जानवर नित्य आतेजाते है और मांसभक्षियों को आकर्षित करते है. यह खेत घने जंगलो को काट के बनाये गए है, इसकी शुरुवात अंग्रेज़ो के शाशनकाल मे हुई थी और २० सदी तक जारी रही, इसलिए इन खेतों मे बाघों का आना स्वाभाविक ही है. ज्यादातर बाघ इन क्षेत्रों मे से अँधेरे का सहारा लेकर, इंसानो और शोरशराबे  से दूर रहते हुए, ख़ामोशी से निकल जाते है. पीलीभीत से बाहर अमरिया गांव के खेतों मे बाघों को अक्सर देखा गया है, और ये इंगित करता है की सामान्यतः बाघ मानवों के समीप रहते हुए भी उनपर हमला नहीं करते है. उपलब्ध आंकड़े इस बात की पुष्टि नहीं करते कि पीटीआर में बाघों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, बल्कि संकेत मिलते है की बाघों की संख्या मे २०१० से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है.

पीलीभीत मे बाघों द्वारा हाल मे किये गए हमलो का मुख्य कारण एक या दो युवा बाघ हो सकते है जिनका अपना कोई इलाका नहीं है या ऐसे अधेड़ बाघ भी हो सकते है जो अपना इलाका खो चुके है. या फिर ऐसे बाघ जो अक्षम, घायल या कमज़ोर हो गए है.

पीलीभीत टाइगर रिज़र्व मे जरूरत है की हम मामला-दर-मामला प्रतिक्रिया करने के बजाये सशक्त और समन्वित दृश्टिकोण को कार्यानवहित करें। हमें पश्चिम बंगाल के सुंदरबन से सबक सीखने की ज़रूरत है जहाँ इंसानों पर बाघों के हमले को नियमित रूप से संभाला जाता है। वहां पर सरकार ने हमला करने वाले बाघों की तेजी से पहचान करने और उन्हें दूसरे स्थान पर ले जाने की कारगर व्यवस्था की है। सरकार ने हमला करने वाले बाघों से लोगों को बचाने के लिए रैपिड रिस्पांस टीम बनाई है। इंसानी बस्तियों के पास में स्थित बाघ विचरण क्षेत्रों में सोलार लाइटें भी लगाई गयी हैं। सुंदरबन के उदाहरण को अपनाते हुए, पीटीआर के प्रशासन को भी रैपिड रिस्पांस टीम  बनाने के कदम उठाने चाहिए। ऐसी टीम में वन्यजीव विशेषज्ञ, वन विभाग के कर्मचारियों, पशु चिकित्सक और स्थानीय स्वयंसेवकों को शामिल करना चाहिए जो संघर्ष की आशंका वाले जानवरों और क्रुद्ध भीड़ को संभालने में प्रशिक्षित हों। स्थानीय पुलिस को भी इन टीमों के साथ बेहतर समन्वयन करना होगा और भीड़ को नियंत्रित करने में मदद करनी होगी। इसके साथ-साथ, शिक्षाविदों और सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवरों को भी इस संघर्ष को कम करने के लिए स्थानीय लोगो से जुड़ने की आवशकता है. 

मानवभक्षी बाघों को रोकने के लिए पीलीभीत टाइगर रिज़र्व को चारो और से बाढ़ लगाकर घेर लेने का प्रस्ताव है जोकि बिलकुल अनुचित और परेशानियों को बढ़ावा देने वाला है. पीटीआर के चारों ओर बाड़ा लगाना न तो व्यावहारिक है और न ही इससे समस्या का समाधान होगा। बाघों और उनके प्राकृतिक आवास पर बाड़ा लगाने से नई परेशानियाँ पैदा होंगी। इससे बाघों का दूसरे टाइगर रिज़र्वो मे आवागमन रुक जायेगा। मनावदृस्टि से देखा जाये तब भी इससे नुकसान ही होगा - अनेको आजीविकायें नष्ट हो जायेंगी जिससे लोगो का आक्रोश और बढ़ेगा।

हमारा अंतिम विश्लेषण यह है की सह-अस्तित्व ही सहज, यथार्थवादी एवं व्यवहारपूर्ण उपाय है. इसको कार्यवाहित करने के लिए बहू-आयामी रणनीति अपनानी होगी जिसके अंतर्गत निम्नलिखित करना होगा
क) ‘समस्या पैदा करने वाले’ बाघों को स्थानांतरित करने के लिए एक तत्पर, समन्वित योजना तैयार करना
ख) खेतों में बाघों के हमलों के खतरे को कम करने के लिए सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना
ग) जंगलों में संघर्ष की आशंका वाले स्थानों पर इंसानी आवाजाही को अस्थाई रूप से नियंत्रित करना, और
घ) इलाके की विशेष भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए भूमि का प्रभावी प्रयोग करना ताकि संघर्ष को कम किया जा सके।

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